श्री राम जी के चरणों में फूल चढ़ाने से लेकर आधुनिक भारत के सबसे पवित्र मंडप को सजाने तक।
शुरुआत
शुरुआत हुई पिता श्री बाल कृष्ण सैनी से — मुंबई के एक माली जिन्हें अयोध्या ने बुलाया। वो श्री राम जी की नगरी में व्यापारी बनकर नहीं, सेवक बनकर आए।
उनके जीवन का काम सरल था: फूल उगाना, मालाएं गूंथना, और भगवान के चरणों में रखना। हर सुबह। हर शाम। दशकों तक।
अगला अध्याय
उनके बच्चे, पुत्र कन्हैया माली (कन्हैया सैनी) और पुत्री पूर्णिमा सैनी, फूलों के बीच बड़े हुए। उन्होंने कला किताबों से नहीं, पिता के हाथों को देखकर सीखी — कौन से फूल भोर में तोड़ने हैं, कौन सी मालाएं कसकर गूंथनी हैं, कौन सी ढीली छोड़नी हैं।
जब 22 जनवरी 2024 को श्री राम लल्ला जी की प्राण प्रतिष्ठा के मंडप को सजाने की पुकार आई, तो वे तैयार थे। सैकड़ों किस्में। हज़ारों मालाएं। करोड़ों दर्शक। एक परिवार की सेवा।
आज
आज, कन्हैया माली और पूर्णिमा सैनी अपने पिता की भक्ति को उस पैमाने पर आगे बढ़ा रहे हैं जिसकी पिता श्री बाल कृष्ण सैनी ने कभी कल्पना नहीं की थी।
विवाह जो गुलाबों में खो जाएं। मंदिर जो दस हज़ार गेंदों से खिल उठें। पूजा किट जो अयोध्या का आशीर्वाद ह्यूस्टन, लंदन और दुबई तक ले जाएं।
फूल अब बड़े हैं। सेवा वही है।
चाहे माला हो, भव्य सजावट हो, या प्रार्थना — हम यहाँ हैं।